बस्तर
यहॉं जंगल कॉंधे पर है
और खेत की मिट्टी
पॉंवों में
ताम्बिया शरीर को छूकर
बहती है नदी
पेडों में बैठकर
सुस्ताता है आसमान
यहॉं हरियाते दिन में
आता है टँगिया
मँगलू के गमछे में
खिलता है पसीने का फूल
सल्फी के नशे में
नाचता है जंगल
डोंगरी में खिलखिलाती हैं लेकियॉं
पिला, डोकरे और डोकरियॉं
यहॉं दिन
फूल की तरह खिलता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है
यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बतिया सकते हैं जंगल से
छू सकते हैं
घने और उँचे पेड
अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि आप खुलकर
हँस न सकें
आओ-आओ बस्तर को छुओ
और जिंदा हो जाओ ।
यहॉं जंगल कॉंधे पर है
और खेत की मिट्टी
पॉंवों में
ताम्बिया शरीर को छूकर
बहती है नदी
पेडों में बैठकर
सुस्ताता है आसमान
यहॉं हरियाते दिन में
आता है टँगिया
मँगलू के गमछे में
खिलता है पसीने का फूल
सल्फी के नशे में
नाचता है जंगल
डोंगरी में खिलखिलाती हैं लेकियॉं
पिला, डोकरे और डोकरियॉं
यहॉं दिन
फूल की तरह खिलता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है
यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बतिया सकते हैं जंगल से
छू सकते हैं
घने और उँचे पेड
अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि आप खुलकर
हँस न सकें
आओ-आओ बस्तर को छुओ
और जिंदा हो जाओ ।
सुंदर .....
जवाब देंहटाएंयहॉं दिन
जवाब देंहटाएंफूल की तरह खिलता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है
यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बतिया सकते हैं जंगल से
छू सकते हैं
घने और उँचे पेड
अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि आप खुलकर
हँस न सकें
ye panktiyan bahut sateek hain
आपकी कविताओं की खुशबू यहाँ हमारे ब्रज-मेवात तक आरही है .वह क्या कहने हैं तुम्हारे .ऐसा तुम ही कह सकते हो विजय सिंह
जवाब देंहटाएंआपकी कविताओं की खुशबू यहाँ हमारे ब्रज-मेवात तक आरही है .वह क्या कहने हैं तुम्हारे .ऐसा तुम ही कह सकते हो विजय सिंह
जवाब देंहटाएंमँगलू के गमछे में
जवाब देंहटाएंखिलता है पसीने का फूल
सल्फी के नशे में
नाचता है जंगल...............सुंदर ....
vijay bhaiya bahut sunder.
जवाब देंहटाएं