रविवार, 10 जून 2012

तिरिया जंगल

तिरिया जंगल

तिरिया का जंगल अभिशप्त नहीं है 
सन्नाटे के लिए , काली मकड़ी जानती है और बुनती है 
तिरिया जंगल में अपना घर 

तिरिया के जंगल में लाल चीटियां पत्तियों की मुस्कान में 
रचती है अपना संसार और टुकुर टुकुर देखती है 
बाहर की दुनिया को 

कभी कभी बांस की झुरमुट से गुर्राता है 
तिरिया जंगल का बाघ और तिरिया जंगल हंस पड़ता है

अक्सर चैत- बैसाख की दुपहरी में आसमान का लाल सूरज
तिरिया के जंगल में आग उगलता है और पंडकी चिड़िया
सागोन की डाल से गाती है गाना जिसे गाव की स्त्रियां सुनती है
यह वह समय है जब गांव की स्त्रियां मुंड में टुकनी उठाये
वनोपज के लिए तिरिया जंगल की ओर निकलती हैं
गांव की स्त्रियों की पदचाप सुन तिरिया जंगल के तेंदूफल पक़ कर गिरते हैं
टप- टप धरती में
आम और चार पक़ कर करते है स्त्रियों के पास आने का इंतजार
गांव की स्त्रियां धूप -धूप , छांव -छांव, पेड़ - पेड़ भरीं दोपहरी में
बेखौफ होकर घूमती है तिरिया के जंगल में

गांव की स्त्रियां तिरिया के जंगल को जानती है
तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों को पहचानता है
यह वह समय है जब तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों की हंसी में
खिलखिलाता , झूमता है ,सरई पत्तों आम , चार और तेंदू से भरी टोकनी मुंड में उठाए
जब लौटती हैं स्त्रियां अपने घर
तब तिरिया जंगल एकदम चुप हो जाता है
तिरिया जंगल की यह चुप्पी आपको सच मुच डरा सकती है ............

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