माँदर
यहां दिन / फूल की तरह खिलता है और रात / मांदर की थाप में नाचती है / ................... आओ-आओ बस्तर को छुओ / और जिंदा हो जाओ |
बुधवार, 27 फ़रवरी 2013
शनिवार, 15 दिसंबर 2012
बस्तर
बस्तर
यहॉं जंगल कॉंधे पर है
और खेत की मिट्टी
पॉंवों में
ताम्बिया शरीर को छूकर
बहती है नदी
पेडों में बैठकर
सुस्ताता है आसमान
यहॉं हरियाते दिन में
आता है टँगिया
मँगलू के गमछे में
खिलता है पसीने का फूल
सल्फी के नशे में
नाचता है जंगल
डोंगरी में खिलखिलाती हैं लेकियॉं
पिला, डोकरे और डोकरियॉं
यहॉं दिन
फूल की तरह खिलता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है
यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बतिया सकते हैं जंगल से
छू सकते हैं
घने और उँचे पेड
अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि आप खुलकर
हँस न सकें
आओ-आओ बस्तर को छुओ
और जिंदा हो जाओ ।
यहॉं जंगल कॉंधे पर है
और खेत की मिट्टी
पॉंवों में
ताम्बिया शरीर को छूकर
बहती है नदी
पेडों में बैठकर
सुस्ताता है आसमान
यहॉं हरियाते दिन में
आता है टँगिया
मँगलू के गमछे में
खिलता है पसीने का फूल
सल्फी के नशे में
नाचता है जंगल
डोंगरी में खिलखिलाती हैं लेकियॉं
पिला, डोकरे और डोकरियॉं
यहॉं दिन
फूल की तरह खिलता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है
यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बतिया सकते हैं जंगल से
छू सकते हैं
घने और उँचे पेड
अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि आप खुलकर
हँस न सकें
आओ-आओ बस्तर को छुओ
और जिंदा हो जाओ ।
रविवार, 10 जून 2012
तिरिया जंगल
तिरिया जंगल
तिरिया का जंगल अभिशप्त नहीं है
सन्नाटे के लिए , काली मकड़ी जानती है और बुनती है
तिरिया जंगल में अपना घर
तिरिया के जंगल में लाल चीटियां पत्तियों की मुस्कान में
रचती है अपना संसार और टुकुर टुकुर देखती है
बाहर की दुनिया को
कभी कभी बांस की झुरमुट से गुर्राता है
तिरिया जंगल का बाघ और तिरिया जंगल हंस पड़ता है
अक्सर चैत- बैसाख की दुपहरी में आसमान का लाल सूरज
तिरिया के जंगल में आग उगलता है और पंडकी चिड़िया
सागोन की डाल से गाती है गाना जिसे गाव की स्त्रियां सुनती है
यह वह समय है जब गांव की स्त्रियां मुंड में टुकनी उठाये
वनोपज के लिए तिरिया जंगल की ओर निकलती हैं
गांव की स्त्रियों की पदचाप सुन तिरिया जंगल के तेंदूफल पक़ कर गिरते हैं
टप- टप धरती में
आम और चार पक़ कर करते है स्त्रियों के पास आने का इंतजार
गांव की स्त्रियां धूप -धूप , छांव -छांव, पेड़ - पेड़ भरीं दोपहरी में
बेखौफ होकर घूमती है तिरिया के जंगल में
गांव की स्त्रियां तिरिया के जंगल को जानती है
तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों को पहचानता है
यह वह समय है जब तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों की हंसी में
खिलखिलाता , झूमता है ,सरई पत्तों आम , चार और तेंदू से भरी टोकनी मुंड में उठाए
जब लौटती हैं स्त्रियां अपने घर
तब तिरिया जंगल एकदम चुप हो जाता है
तिरिया जंगल की यह चुप्पी आपको सच मुच डरा सकती है ............
तिरिया का जंगल अभिशप्त नहीं है
सन्नाटे के लिए , काली मकड़ी जानती है और बुनती है
तिरिया जंगल में अपना घर
तिरिया के जंगल में लाल चीटियां पत्तियों की मुस्कान में
रचती है अपना संसार और टुकुर टुकुर देखती है
बाहर की दुनिया को
कभी कभी बांस की झुरमुट से गुर्राता है
तिरिया जंगल का बाघ और तिरिया जंगल हंस पड़ता है
अक्सर चैत- बैसाख की दुपहरी में आसमान का लाल सूरज
तिरिया के जंगल में आग उगलता है और पंडकी चिड़िया
सागोन की डाल से गाती है गाना जिसे गाव की स्त्रियां सुनती है
यह वह समय है जब गांव की स्त्रियां मुंड में टुकनी उठाये
वनोपज के लिए तिरिया जंगल की ओर निकलती हैं
गांव की स्त्रियों की पदचाप सुन तिरिया जंगल के तेंदूफल पक़ कर गिरते हैं
टप- टप धरती में
आम और चार पक़ कर करते है स्त्रियों के पास आने का इंतजार
गांव की स्त्रियां धूप -धूप , छांव -छांव, पेड़ - पेड़ भरीं दोपहरी में
बेखौफ होकर घूमती है तिरिया के जंगल में
गांव की स्त्रियां तिरिया के जंगल को जानती है
तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों को पहचानता है
यह वह समय है जब तिरिया का जंगल गांव की स्त्रियों की हंसी में
खिलखिलाता , झूमता है ,सरई पत्तों आम , चार और तेंदू से भरी टोकनी मुंड में उठाए
जब लौटती हैं स्त्रियां अपने घर
तब तिरिया जंगल एकदम चुप हो जाता है
तिरिया जंगल की यह चुप्पी आपको सच मुच डरा सकती है ............
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