शनिवार, 15 दिसंबर 2012

बस्‍तर

बस्‍तर  


यहॉं जंगल कॉंधे पर है
और खेत की मि‍ट्टी
पॉंवों में

ताम्‍बि‍या शरीर को छूकर
बहती है नदी
पेडों में बैठकर
सुस्‍ताता है आसमान

यहॉं हरि‍याते दि‍न में
आता है टँगि‍या

मँगलू के गमछे में
खि‍लता है पसीने का फूल
सल्‍फी के नशे में
नाचता है जंगल

डोंगरी में खि‍लखि‍लाती हैं लेकि‍यॉं
पि‍ला, डोकरे और डोकरि‍यॉं

यहॉं दि‍न
फूल की तरह खि‍लता है और रात
मांदर की थाप में नाचती है

यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
बति‍या सकते हैं जंगल से

छू सकते हैं
घने और उँचे पेड

अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
कि‍ आप खुलकर
हँस न सकें

आओ-आओ बस्‍तर को छुओ
और जिंदा हो जाओ । 

6 टिप्‍पणियां:

  1. यहॉं दि‍न
    फूल की तरह खि‍लता है और रात
    मांदर की थाप में नाचती है

    यहॉं आप सॉंस ले सकते हैं
    बति‍या सकते हैं जंगल से

    छू सकते हैं
    घने और उँचे पेड

    अभी इतना भी बुरा समय नहीं है यहॉं
    कि‍ आप खुलकर
    हँस न सकें
    ye panktiyan bahut sateek hain

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  2. आपकी कविताओं की खुशबू यहाँ हमारे ब्रज-मेवात तक आरही है .वह क्या कहने हैं तुम्हारे .ऐसा तुम ही कह सकते हो विजय सिंह

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  3. आपकी कविताओं की खुशबू यहाँ हमारे ब्रज-मेवात तक आरही है .वह क्या कहने हैं तुम्हारे .ऐसा तुम ही कह सकते हो विजय सिंह

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  4. मँगलू के गमछे में
    खि‍लता है पसीने का फूल
    सल्‍फी के नशे में
    नाचता है जंगल...............सुंदर ....

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